हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अंजुमन-ए-शरई शियान-ए-जम्मू व कश्मीर के तत्वावधान में और संगठन के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आग़ा सय्यद हसन अल-मूसवी के नेतृत्व में 25 सफ़र अल-मुज़फ़्फ़र को दरगंड बमनाह में अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ मजलिस-ए-अज़ा और जुलूस-ए-अलम निकाला गया।
मजलिस-ए-अज़ा और जुलूस में शोक मनाने वालों की बड़ी संख्या ने उत्साहपूर्ण अंदाज़ में भाग लिया और अपनी श्रद्धा एवं वफ़ादारी का इज़हार किया।
अंजुमन-ए-शरई शियान के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आग़ा सय्यद हसन मूसवी ने मजलिस-ए-अज़ा से अपने भाषण में कहा कि पवित्र क़ुरआन और अहल-ए-बैत (अ.) उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए मार्गदर्शन के दो अविभाज्य स्रोत हैं, जैसा कि रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) ने स्पष्ट रूप से ताकीद फरमाई है।
उन्होंने कहा कि अहल-ए-बैत (अ.) से प्रेम और श्रद्धा महज़ ज़बानी दावों या रस्मी कार्यों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनकी शिक्षाओं पर अमल, सुंदर चरित्र, सत्यपरस्ती और न्याय एवं इंसाफ़ के लिए व्यावहारिक वचनबद्धता के ज़रिए इस प्रेम का इज़हार होना चाहिए।
वाक़िया-ए-करबला के अमिट संदेश को उभारते हुए आक़ा सय्यद हसन ने कहा कि इमाम हुसैन (अ.) की महान कुर्बानी ज़ुल्म, बातिल और नैतिक समझौते के ख़िलाफ़ एक निर्णायक विद्रोह था, जबकि अज़ादारी का उद्देश्य इस संदेश को ज़िंदा रखते हुए मोमिनों (ईमानवालों) में आत्म-सुधार, सत्य-वचनता, दृढ़ता और धर्मनिष्ठा की भावना जागृत करना है।
उन्होंने मोमिनों पर ज़ोर दिया कि वे क़ुरआन और अहल-ए-बैत (अ.) से अपने संबंधों को और मजबूत करें, अज़ादारी की पवित्रता एवं गरिमा को बनाए रखें और संदेश-ए-करबला को अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में व्यावहारिक रूप से लागू करें।
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